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20 मई 2024

अलंकार की परिभाषा, भेद और उदाहरण सहित सम्पूर्ण जानकारी ।

अलंकार का शाब्दिक अर्थ होता है कि आभूषण। अलंकार दो शब्दों से मिलकर बनता हैः अलम + कार। जो किसी वस्तु को अलंकृत करे, वह अलंकार कहलाता है। जिस प्रकार आभूषण स्वर्ण से बनते हैं, उसी प्रकार अलंकार भी सुवर्ण (सुंदर वर्ण) से बनते हैं। अलंकार हिंदी व्याकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा है । इस ब्लाॅग हम अलंकार की परिभाषा, भेद और उदाहरण जानेंगे।


अलंकार  किसे कहते हैं?
अलंकरोति इति अलंकार
भारतीय साहित्य के अंदर जिन शब्दों के द्वारा किसी वाक्य को सजाया जाता है, उन्हें अलंकार कहते हैं।

अनुप्रास
उपमा 
रूपक 
यमक
श्लेष
उत्प्रेक्षा 
संदेह
अतिशयोक्ति आदि।
अलंकार के भेद क्या हैं?
अलंकार को व्याकरण के अंदर उनके गुणों के आधार पर तीन हिस्सों में बांटा गया हैः

1. शब्दालंकार 
2. अर्थालंकार 
3. उभयालंकार
शब्दालंकार क्या है?
शब्दालंकार दो शब्दों से मिलकर बना होता है – शब्द + अलंकार , जिसके दो रूप होते हैं –ध्वनी और अर्थ। जब अलंकार किसी विशेष शब्द की स्थिति में ही रहे और उस शब्द की जगह पर कोई और पर्यायवाची शब्द का इस्तेमाल कर देने से उस शब्द का अस्तित्व ही न बचे तो ऐसी स्थिति को शब्दालंकार कहते हैं। जिस अलंकार में शब्दों का प्रयोग करने से कोई चमत्कार हो जाता है और उन शब्दों की जगह पर समानार्थी शब्द को रखने से वो चमत्कार कहीं गायब हो जाता है तो, ऐसी प्रक्रिया को शब्दालंकार कहा जाता है।

शब्दालंकार के भेद
अलंकार के अंतर्गत शब्दालंकार के 6 भेद इस प्रकार हैं:


अनुप्रास अलंकार
यमक अलंकार
पुनरुक्ति अलंकार
विप्सा अलंकार
वक्रोक्ति अलंकार
श्लेष अलंकार

अनुप्रास अलंकार
अनुप्रास अलंकार दो शब्दों से मिलकर बनता है:

अनु + प्रास

अनु का अर्थ होता है बार बार
प्रास अर्थ होता है – वर्ण
जब किसी भी वर्ण की बार-बार आवृत्ति हो तब जो चमत्कार होता है वह अनुप्रास अलंकार कहलाता है।
उदाहरण

जन रंजन भंजन दनुज मनुज रूप सुर भूप
विश्व बदर इव द्रुत उधर जोवत सोवत सूप।
यह भी पढ़ें : Yamak Alankar क्या है, साथ ही जानिये इसके भेद और उदाहरण

अनुप्रास के उपभेद
अनुप्रास के उपभेद इस प्रकार हैं :-

1. छेकानुप्रास अलंकार
2. वृतानुप्रास अलंकार
3. लाटानुप्रास अलंकार
4. अत्नयानुप्रास अलंकार
5. श्रुत्यानुप्रास। अलंकार

छेकानुप्रास अलंकार-जिस जगह पर स्वरूप और क्रम से अनेक व्यंजनों की आवृत्ति एक बार हो वहां पर छेकानुप्रास Alankar का प्रयोग होता है। जैसे-

रीझि रीझि रस्सी रस्सी हंसी हंसी उठे
सासे भरी आंसू भरी कहत दही दही।
वृतानुप्रास अलंकार– जब व्यंजन की आवृत्ति बार-बार हो वहां पर वृतानुप्रास अलंकार कहलाता है। उदाहरण:

चामर सी, चंदन सी, चांद सी, चांदनी चमेली चारुचंद्र सुघर है।
लाटानुप्रास अलंकार– जिस जगह पर शब्द और वाक्य की आवृत्ति हो और प्रत्येक जगह पर अर्थ भी वहीं पर अनवय करने पर भीनता आ जाए तो उस जगह लाटानुप्रास Alankar कहलाता है। उदाहरण:

तेग बहादुर , हां , वे ही थे गुरु पदवी के पात्र समर्थ ,
तेग बहादुर , हां , वे ही थे गुरु पदवी थी जिनके अर्थ
अत्नयानुप्रास अलंकार-जिस जगह अंत में तुक मिलती हो वहां पर अनंतयानुप्रास अलंकार होता है। उदाहरण:

लगा दी किसने आकर आग।
कहां था तू संशय के नाग?
श्रुत्यानुप्रास अलंकार– जिस जगह पर कानों को मधुर लगने वाले वनों का आवृत्ति हो उस जगह श्रुत्यानुप्रास Alankar आता है। उदाहरण:

दिनांक था , थे दीनानाथ डूबते ,
 सधेनु आते गृह ग्वाल बाल थे।
यमक अलंकार– यमक शब्द का अर्थ होता है कि दो। जब एक ही शब्द का बार बार प्रयोग हो और हर बार अर्थ अलग-अलग आए वहां पर यमक Alankar होता है। उदाहरण:

कनक कनक ते सौगुनी, मादकता अधिकाय।
भाग खाए बौराए नर , वा पाते बौराये
पुनरुक्ति अलंकार– पुनरुक्ति अलंकार 2 शब्दों को मिलकर बनता है:
पुनः + उक्ति
जब कोई शब्द दो बार दोहराया जाता है तो उस जगह पर पुनरुक्ति अलंकार होता है।

विप्सा अलंकार– जब आदर, हर्ष, शोक विस्मयादिबोधक आदि भावों को प्रभावशाली रूप से व्यक्त करने के लिए जिस शब्दों का प्रयोग होता है वह पुनरावृति को ही विप्सा Alankar कहते हैं। उदाहरण:

मोही मोही मोहन को मन भयो राधामय
राधा मन मोही मोही मोहन मयी मयी

वक्रोक्ति अलंकार

जिस जगह पर वक्ता के द्वारा बोले गए शब्दों का श्रोता द्वारा अलग अर्थ निकल कर आता है उसे वक्रोक्ति Alankar कहते हैं।

वक्रोक्ति अलंकार के भेद
काकू वक्रोक्ति
श्लेष वक्रोक्ति।
काकू वक्रोक्ति अलंकार– जब वक्ता के द्वारा बोले गए शब्दों को उसके कंठ ध्वनि के कारण श्रोता कुछ अन्य प्रकार का अर्थ निकाले उसे काकू वक्रोक्ति Alankar कहते हैं। उदाहरण:

मैं सुकुमारी नाथ बन जोगू।

श्लेष वक्रोक्ति अलंकार-जिस जगह पर श्लेष की वजह से वक्ता के द्वारा बोले गए शब्दों का अलग प्रकार का अर्थ निकाल कर आता है वहां श्लेष वक्रोक्ति Alankar होता है। उदाहरण:

रहीमन पानी रखिए बिन पानी सब सून ।
पानी गए न ऊबरे मोती मानस चून।
अर्थालंकार
जिस जगह पर अर्थ के माध्यम से काव्य में चमत्कार होता हो उस जगह अर्थालंकार होता है।



अर्थालंकार 
 
जहाँ पर अर्थों के माध्यम से वाक्य में चमत्कार उत्पन्न किया जाता हैं वहाँ पर अर्थालंकार होता हैं। ये मूल रूप से पांच प्रकार के होते हैं। 

1. उपमा अलंकार 
2. रूपक अलंकार 
3.उत्प्रेक्षा अलंकार 
4.अतिश्योक्ति अलंकार 
5. मानवीकरण अलंकार 
 
1. उपमा अलंकार 

उपमा शब्द का अर्थ तुलना करना होता हैं। जहाँ पर किसी व्यक्ति या वस्तु की तुलना किसी और से की जाती हैं वहाँ उपमा अलंकार होता है। अर्थात जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना व्यक्त की जाती है वहाँ उपमा अलंकार होता हैं। जैसे 

सागर सा गंभीर ह्रदय हो। 
 
2. रूपक अलंकार

जहाँ पर उपमाये और उपमान में कोई अंतर न हो अर्थात जहाँ उपमाये उपमान का भेद रहित आरोप हो वहाँ पर रूपक अलंकार होता है। जैसे 

चरन कमल हरि कमल से। 

3. उत्प्रेक्षा अलंकार 

जहाँ पर उपमान न होने पर उपमेय को ही उपमान मान लिया जाता हैं वहाँ पर उत्प्रेक्षा अलंकार होता हैं। इसमें मनु ,मानो, जनु, जानो आदि शब्दो का प्रयोग किया जाता हैं। जैसे 

सखि सोहत गोपाल के ,उर गुंजन की माला। 

बहार लसत मनो पिये , दावानल की ज्वाला। 


4 अतिशयोक्ति 
जब किसी की प्रसंशा करते समय बात को इतना बढ़ा-चढ़ा कर कहा जाए जो संभव न हो तथा किसी बात की अति की जाए वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।

उदाहरण–:1) हनुमान की पूंछ में, लग ना पाई आग। लंका सिगरी जलि गई, गए निशाचर भाग।।

यहाँ पर बात को बढ़ा चढ़ाकर कहा गया है की हनुमान की पूँछ में आग भी नही लगी और सारी लंका जल गई और राक्षस भाग गए, इसलिए यहाँ अतिशयोक्ति अलंकार है।

5) मानवीकरण 
जहाँ पर प्रकृति चीजों और जड़ वस्तुओं पर मानवीय आरोप किया जाए या वस्तुओं को मानव जैसा सजीव वर्णन कर दें, वहाँ पर मानवीकरण अलंकार होता है। 

 फूल हँसे कलियां मुस्कुराई।

यहाँ पर फूलों के हँसने और कलियों के मुस्कुराने पर मानवीय आरोप किया गया है, इसलिए यहाँ मानवीकरण अलंकार है।


उभयालंकार

ऐसे प्रकार का Alankar जिसके अंदर शब्दालंकार और अर्थालंकार दोनों का योग होता हो। इसका अर्थ है जो Alankar शब्द और अर्थ दोनों पर आधारित रहकर दोनों को चमत्कारी करते हैं उन्हें उभयालंकार कहलाते हैं।

उदाहरण: कजरारी अखियन में कजरारी न लखाय।

उभयालंकार के भेद
उभयालंकार के दो भेद हैं:

1. संसृष्टि
2. संकर।

  संसृष्टि  
तिल तुडल न्याय से परस्पर निरपेक्ष अनेक अलंकारों की स्थिति संसृष्टि अलंकार कहलाता है।

जिस प्रकार तीन और सुंदर मिलकर भी पृथक दिखाई पड़ते हैं।
ठीक उसी प्रकार संसृष्टि Alankar में कई प्रकार के Alankar मिले रहते हैं।
परंतु उनकी पहचान में किसी प्रकार की कठिनाई बिल्कुल भी नहीं होती।
संसृष्टि के अंदर शब्दालंकार ,अर्थालंकार और कई शब्द Alankar और अर्थालंकार एक साथ भी रह सकते हैं।
उदाहरण:

भुक्ति भव्नु शोभा सुहावा। सुरपति सदनु न परतर पावा। 
मनी माय रचित चारों चौबरे । जनू रतिपति निज हाथ सवारे।

संकर 
नीर क्षीर न्याय से परस्पर मिश्रित Alankar संकर अलंकार कहते हैं। 

उदाहरणः

जिस प्रकार से नीर-क्षीर का अर्थ होता है पानी और दूध मिलकर एक हो जाता है ठीक उसी प्रकार संकर अलंकार में कई अलंकार इस प्रकार मिल जाते हैं
सठ सुधरी संग संगती पाई पारस परस खुदा तो सुहाई।



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